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ईश्वर: सच और कल्पना

                
                                                         
                            कैसी होगी उसकी दुनिया, जिसने इस दुनिया को बनाया।
                                                                 
                            

क्या सच में बंटे होंगे वो — ईश्वर, अल्लाह और जीसस में?
और होंगे सुमेरियन गॉड भी वहाँ, वक़्त की धूल में जो अब हो चुके हैं पुराने।

क्या होते होंगे युद्ध वहाँ भी, या रहते होंगे आपस में मिलके
सेलिब्रेट करते होंगे एक दूसरे का बर्थडे,
या होंगे दुश्मन आपस में।

क्या सच में होगा उनका एक परिवार —
शिव जी, गणेश, कार्तिकेय और पार्वती?

या ये सब है इंसान का कमाल।
है एक ही कोई, जिसे दे चुका कई वो नाम।

जैसे करता है यहाँ वो काम,
जैसी ज़रूरत वैसा व्यवहार,
जिससे काम उसका नाम।

सिर्फ एक ही होगा वो सर्वशक्तिमान,
और हँसता होगा — “वाह रे इंसान,
मैंने बनाया तुझको, और तू मुझको ही बना गया,
पैसा, शक्ति और नाम के लिए, सबको आपस में लड़ा दिया।

लेकिन फिर एक और आता है ख्याल —
क्या ऊब न जाता होगा अकेले, वो एक महान?

या हम ही हैं उसके वो खिलौने,
जिन्हें नित रचता, खेलता और मिटाता है भगवान।
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एक घंटा पहले

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