कहीं न कहीं तो मिलोगे कहीं पे हम को यकीं है...
उस रोज़ उस लम्हे को जी भर के जी लेना चाहेंगे,
कभी ना कभी तो मिलोग कहीं पे हम को यकीं है..
जिसकी इल्तेजा और ख्वाहिश-ए-दीदार में दिन बिताये उसे रूबरू पा लेंगे
वो जो कसक है दिल में उन्हें छू लेने की, उनके आगोश में समा जाने की
सच पूछिये तो उस लम्हे के लिए एक उम्र बिता डालेंगे
ऐसा नहीं है के लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ सच ही कहा हमने..
आखिर इंसान हैं, ख़ुदा नहीं जो ये निभा लेंगे..
वो आ गए जो सामने इल्तजा-ए-नाचीज़ सुनकर
हम उन्हें सीने से.. होंठों से लगा लेंगे..
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