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जिस दिन मनुष्यता हार जाती है,

                
                                                         
                            हर दिन हारती मनुष्यता
                                                                 
                            
से अनभिज्ञ मनुष्य को
वहम हो चला है...
वहम हो चला है कि,
उसने  समाज बचा लिया
संस्कृति बचा ली
धर्म बचा लिया,
अब उसे कौन बताए  माधव...
कौन बताए ? कि,
जिस दिन मनुष्यता हार जाती है,
उस दिन न समाज बचता है,
न संस्कृति, न धर्म।
क्योंकि,
मनुष्यता ही वह मूल है
जिससे सबका अस्तित्व है
जड़ सूख जाए तो फिर
शाखाओं के बचने का
प्रश्न ही कहाँ रहता है माधव।
- चित्रा मलिक~
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3 घंटे पहले

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