इतने खरे से सवाल जवाब,
नहीं होने चाहिए,
इतने साक्ष्य प्रमाण,
नहीं होने चाहिए ,
माना हो जाती है,
खींचतान थोड़ी सी ,
पर इतने आरोप-प्रत्यारोप ,
नहीं होने चाहिए ,
आखिर घर है संसद नहीं।
चुनाव नहीं जीता था ,
ब्याह कर लाए थे,
लाखों में एक चुन कर,
5 वर्षों के लिए नहीं,
सात जन्मों के वादे कर,
अनेक बार मुस्काये थे,
उलझनों से लड़कर,
कब से ये जीवन के हिसाब,
कच्चे पड़ने लगे ,
कब से हम एकदूसरे का,
हिसाब रखने लगे,
अविश्वास लाने की,
जरूरत क्या थी,
पूरी दुनिया को बताने की,
जरूरत क्या थी।
आखिर घर है संसद नहीं।
कोई बात खटकी थी,
तो धीरे से पूछ लेती,
समय की बढ़ती दूरियों में,
खुद बढ़कर हाथ थाम लेती,
घुल जाती व्यथाएं सारी,
मोम की तरह,
घर की सीमाएं बताने की,
जरूरत क्या थी।
आखिर घर है संसद नहीं।
मेरी कुछ खामियों ने,
माना कि तुम्हें संजीदा किया,
मेरी कुछ लापरवाहियों ने,
माना कि घर के बगीचे को ,
हरा न होने दिया,
थोड़ा सींच देती तुम भी,
तो बच जाते,
झुलसती तपिश से कुछ पौधे,
नया गुलशन बनाने की ,
जरूरत क्या थी,
आखिर घर है संसद नहीं।
मेरे ख्याल नापसंद थे ,
तो कुछ अपने बताए होते,
मेरी ख़ामियों के दस्तावेज तो,
न बनाये होते,
एक बार बैठकर ,
सुलझा लिया होता,
अपनी सुना कर,
कुछ मुझसे सुना होता,
मैं तो मिट ही गया,
खुद को भी मिटाने की ,
जरूरत क्या थी,
आखिर घर है, संसद नहीं।
-माधुरी महाकाश
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