फुदक फुदक कर चलती
नन्ही सी वह चिड़िया
गेहूँ के दानों को चुनती
प्यारी सी गौरैया।
तुमने देखा है क्या?
जरा मुझे भी दिखलाना
ऊँचे ऊँचे फ्लैटों में
एक गौरैया ले आना।
रोज सुबह गौरैया की चह चह से
फुलवारी मुस्काती थी
छत पर झुण्ड बना कर वह
चावल के दाने खाती थी।
खेत गए.. खलिहान गए..
नन्हीं गौरैया के अरमान गए..
नीम कटा जब , जगह मिली थी
उसके नीड़ की आस मिटी थी।
कहाँ गयी वह प्राणों की रेखा?
क्या तुमने घर आंगन में देखा?
जब भी पुरवाई परदे को जरा हिला भर देती है
लगता है वह फिर आ बैठी
कोमल आस जगा देती है।
दूर खड़ी सदी उस पार
पूछ रही आँगन का द्वार
उजड़े नीड़ देख कर रोती
ले कटे हुए पेड़ों का भार।
पत्थर के शहर बने सुंदर
पानी , बजरी के दाने हैं
रूठ गयी वो नन्ही धड़कन
निर्णय सारे मनमाने हैं।
दिवस बनेंगे गौरैया के
कविता खूब लिखी जाएगी
"स्पैरो हाउस" का फ़ैशन होगा
माटी की गौरैया मुस्कायेगी।
-माधुरी महाकाश
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