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दशहरा

                
                                                         
                            आती है हर साल दिवाली
                                                                 
                            
नहीं दशहरा अब आता है
मेघनाद के ऊँचे पुतलों संग
रावण का कद बढ़ जाता है।

अब भी बैठी है सीता माँ
लंका की उस फुलवारी में
नहीं सुरक्षित अशोक वाटिका
है जनकसुता लाचारी में।
कैसे छलांग लगाएं हनुमत
पापी सागर लहराता है

मेघनाद के ऊँचे पुतलों संग
रावण का कद बढ़ जाता है।

प्रलय मचा है जगत सिंधु में
उगल रहे विष विषधर व्याल
देख व्यथित रो रही धरा यह
कैसे कुत्सित माँ के लाल ।
आदर्शों की परिपाटी धूमिल
व्यभिचारी शोर मचाता है।
मेघनाद के ऊँचे पुतलों संग
रावण का कद बढ़ जाता है।

अनेक शस्त्र हाथ में लेकर
नव दुर्गा तो आती है
पहन असुर मुंडों की माला
काली जिह्वा फैलाती हैं
रक्त छुपा जो रक्तबीज का
फिर से माया रच जाता है।
मेघनाथ के ऊंचे पुतलों संग
कद रावण का बढ़ जाता है।

आती है हर साल दिवाली
नहीं दशहरा अब आता है
मेघनाद के ऊँचे पुतलों संग
रावण का कद बढ़ जाता है।

~ माधुरी महाकाश
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एक वर्ष पहले

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