भारत की माटी धिक्कार रही,
परिवर्तन की नव गलियों को,
जौहर की धरती पुकार रही,
सोती सी पद्मिनियों को।
लाचार लहू क्यों हो रहा,
बेजार लहू क्यों रो रहा,
वीर वंश की लाज नहीं,
ड्योढ़ी की वह साज नहीं ,
खाली खाली देहरी आज,
पुकार रही नववधुओं को,
जौहर की धरती पुकार रही,
सोई सी पद्मिनियों को।
भूली धर्म ध्वजा अपनी,
भूली अपनी जन्म कहानी ,
कर आत्मसात कुछ बचकाने पन्ने ,
खोई वह पहचान पुरानी,
जनमानस की ललकार यही ,
स्वाभिमान फुफकार यही ,
माटी स्वयं हुंकार भर रही,
जगा रही है नवकलियों को,
जौहर की धरती पुकार रही ,
सोई सी पद्मिनियों को।
आन बान था अति निश्चिंत ,
जिन कंधों पर सोया था,
काल स्वयं नतमस्तक हो,
जिन चरणों में रोया था,
उन चरणों की रज से,
तिलक कर रही रण रथियों को ,
जौहर की धरती पुकार रही,
सोई सी पद्मिनियों को।
क्यों शीत हो गए रक्त वे,
जिनमें मस्त रवानी थी,
कहां गई वह खोई मीरा,
वह अद्भुत प्रेम कहानी थी ,
लक्ष्मी की तलवार पुकार रही,
अनेक जवानी वार रही,
थोड़ा धरती पर भार सही,
आज खड़ी ललकार रही,
इन मदमाती सी अलियों को,
जौहर की धरती पुकार रही,
सोई सी पद्मिनियों को।
कैसे भूली भुजबल को,
कैसे भूली अक्षुण्ण पल को ,
चंद कुटिल से किस्सों में,
चंद रुपहले हिस्सों में,
गरिमा के किसलय वार दिए ,
स्वाभिमान की ड्योढ़ी पर क्यों,
तुमने चौखट पार किए,
माटी पुनः सँवार रही ,
उन वीरांगना वधुओं को,
जौहर की धरती पुकार रही ,
खोई सी पद्मिनियों को।
सर्वस्व लुटाना उचित नहीं
हे वीर वंश की मुकुट लाज ,
इतिहास झुठलाना उचित नहीं ,
हे भारत भूमि की कल्पलता,
कल्पतरू का मान लिए,
अमरत्व का अमर गान लिए,
नेत्रों में स्वाभिमान लिए,
मनु पुत्री का अभिमान लिए ,
मुक्त कंठ की सुंदरतम प्रज्ञा ,
पुकार रही हंसिनियों को,
भारत की धरती पुकार रही,
सोती सी पद्मिनियों को।
-माधुरी महाकाश
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