तन पर पड़ती हर एक लाठी,मन के छालो से छोटी है
तुम क्या छिनोगे अधिकार मेरा,जब थाली ही मेरी रीति है
कागज के झूठी उमीदों से ,सपनो को रोज मरते देखा है
जिसने भविष्य ही धुँधला देखा हो,वो लाठी का डर कब देखा गा।
मार लो लाठी तोड़ लो जिस्म ,पर उमीद कहा से तोड़ोगे
जो दर्द दिलो में गहरा है,उसे किस लाठी से तुम तोड़ोगे
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