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नाग पंचमी

                
                                                         
                            "नाग पंचमी "
                                                                 
                            

तरह तरह के नाग घूमते धरती के कोने कोने में,
विष दंतों से जहर उगले हर मन के कोने कोने में।।

सभ्यता संस्कृति को डसते रहते हर जन इनसे डरता।
जिसको भी डस लें ये तड़प तड़प कर फिर वो मरता।।

नाग पंचमी पर जगह-जगह नागों की पूजा करते हैं।
गली गली में घूमते नाग हरपल कितनों को डसते हैं।।

शिव शंकर ने इन नागों को गले का हार बनाया है।
शक्ति सामर्थ्य का यह भाव हर जन को समझाया है।।

क्रोध नाग का रूप रंग तन का काला यह कर देता है।
कुछ पल का क्रोध मानव को मन से पंगु कर देता है।।

धन संपत्ति का रक्षक भी नाग वंश को कहा जाता है।
जहर उगलते नागों को अतुलित धन मिल जाता है।।

विष दंत जिसके तन में कभी गहराई तक धंस जाते हैं।
समझो उसके जीवन में मृत्यु के बादल ही बरसते हैं।।

हर अस्त्र शस्त्रों से बढ़कर शब्दों का विष घातक होता।
जिसके मन में विष भरा वो नागों का समकक्ष होता।।

बहन बेटियों की इज्जत ये नाग रोज रोज दूषित करते।
गली गली में घूमते नाग हर पल किस किस ये डसते।।

इन नागों की बढ़ती संख्या हर रोज ही बढ़ती जाती है।
जितने नागों का दमन करो उससे दुगनी बढ जाती है।।

यह कहना संभव नहीं नाग भक्षक संग रक्षक भी होते।
मौका मिले तो अपने विष दंतों से चुपके से डस जाते।।

नाग पंचमी मुबारक सबको नागों को है नमन हमारा।
खैर मनाएं जीवन की वरना हर ओर अंधेरा ही अंधेरा।।

शिव शंभू तो भोलेनाथ है विष उनपर नहीं चढ़ सकता।
आम इंसान तो इन विष दंतों से कभी न बच सकता।।

इन विष दंतों के कारण ही मानव इनसे भय खाता है।
वरना इंसान इन नागों को सलाद समझ खा जाता।।

ईश्वर ने हर किसी को शक्ति देकर दुनिया में भेजा है।
एक मानव ऐसा प्राणी है हर रूप रंग में यह मिलता है।।

इन नागों से घातक तो दुनिया में घातक मानव है।
घटिया सोच के कारण इससे बड़ा न कोई दानव है।।

नाग तो केवल दबाव वश स्वरक्षा हित काटा करते हैं।
मगर मानव रूपी दानव तो रोज कोहराम मचाते हैं।।

चन्द्र शेखर मार्कंडेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 घंटे पहले

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