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वो मेरी बात नहीं मानती

                
                                                         
                            वो मेरी बात नहीं मानती
                                                                 
                            

वो मेरी बात कभी नहीं मानती,
मगर हर उलझन में मुझे ही पुकारती है,
मैं रास्ता बताता हूँ उसे,
वो रास्ता छोड़ देती है—
फिर भी अगली सुबह पूछती है,
“भाई, अब क्या करूँ?”

माँ से जो राज़ छुपे रहते हैं,
वो मेरे पास आकर खुल जाते हैं,
मेरी खामोशियों के भी अर्थ जानती है,
और अपनी हर अनकही बात
मेरे सामने रख जाती है।

हम भाई-बहन कम,
शायद एक-दूसरे की
छोटी-सी दुनिया ज़्यादा हैं,
जहाँ शिकायतें भी अपनी हैं,
झगड़े भी अपने हैं,
और चुप्पियाँ भी समझी जाती हैं।

वो सलाह माँगती है,
मैं बड़ी गंभीरता से देता हूँ,
वो पूरी बहस करती है,
हर तर्क को उलट देती है,
और आख़िर में वही करती है
जो पहले से उसके दिल ने तय किया था।

अजीब लड़की है—
मेरी बात कभी नहीं मानेगी,
लेकिन मेरी बात सुने बिना
उसका कोई फैसला भी पूरा नहीं होगा।

दुनिया का कोई कुछ कह दे,
तो उसे सही लग जाता है,
मैं वही बात कह दूँ—
तो बहस का एक नया अध्याय खुल जाता है।

शायद उसे मेरी बात पर भरोसा नहीं,
शायद उसे मुझ पर इतना भरोसा है
कि मेरी बात गलत होने पर भी
मैं उसका अपना ही रहूँगा।

उसे गणित खूब आती है,
अंकों से खेलना जानती है,
लेकिन मुझसे बातें करते-करते
न जाने कहाँ खो जाती हैं
उसके सारे हिसाब-किताब।

अपना सामान
वो खुद उठा सकती है,
मगर मैं साथ चल दूँ
तो अचानक उसके कंधे थक जाते हैं

“भाई, ये तुम पकड़ लो…”

वो खुद कमाती है,
अपने सपनों का खर्च खुद उठाती है,
मगर बाज़ार में मेरे साथ हो
तो न जाने क्यों
हर बिल मेरी तरफ़ मुस्कुराता है।

मेरे बैंक खाते के
कुछ ज़ीरो कम हो गए हैं,
और उन ज़ीरों की कहानी
मेरी बहन से बेहतर
कौन लिख सकता है।

फिर भी जब वो कहती है—
“भाई, आते हुए चावल लेते आना,”
तो मेरी जेब शिकायत करती है,
मगर दिल…
चुपचाप हाँ कह देता है।

हर बार कहती है—
“इस बार पक्का, मूवी चलेंगे।”

मैं भी हर बार
उसकी बात पर यक़ीन कर लेता हूँ,
फिर जाने का वक़्त आता है
और मूवी कहीं पीछे छूट जाती है—

हम आइसक्रीम लेकर लौट आते हैं।

अब लगता है,
शायद मूवी कभी मक़सद थी ही नहीं,
मक़सद तो बस इतना था—
एक साथ थोड़ा वक़्त बिताना।

उसे लगता है
कि उससे ज़्यादा खूबसूरत
इस दुनिया में कोई नहीं,
और हर बार मुझे
उसके इस विश्वास की अदालत में
गवाही देनी पड़ती है।

वो तुलना करती है सबसे,
और हर तुलना में
खुद को जीतते हुए देखती है।

और मैं सोचता हूँ—
“चलो, आज भी बहन खुश है,
तो फैसला सही ही होगा।”

उसकी अपनी एक दुनिया है,
जहाँ वो नखरे भी करती है,
जिद भी करती है,
बहस भी करती है,
और बेझिझक अपना हक़ भी जताती है।

शायद क्योंकि
उसे पता है—

भाई से माँगा हुआ
सिर्फ़ सामान नहीं होता,
उसमें थोड़ा-सा अपनापन भी होता है।

एक दिन शायद
हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में
बहुत दूर निकल जाएँगे।

न रोज़ की बहस होगी,
न अचानक फोन आएगा,
न कोई कहेगा—
“भाई, चावल लेते आना।”

उस दिन शायद
मेरा बैंक बैलेंस भी
थोड़ा खुश होगा।

मगर न जाने क्यों
मेरा दिल शायद
उस खालीपन को ढूँढ़ेगा
जिससे आज कभी-कभी
मैं परेशान हो जाता हूँ।

मुझे उसके झगड़े याद आएँगे,
उसकी बेवजह की बहसें याद आएँगी,
उसके अधूरे मूवी प्लान,
उसकी आइसक्रीम,
उसकी माँगी हुई चीज़ें,
और उसकी वो आवाज़

“भाई…”

क्योंकि कुछ रिश्ते
बड़े-बड़े वादों से नहीं बनते,
वे बनते हैं
छोटी-छोटी माँगों से,
बेवजह की बहसों से,
बिना वजह किए गए फोन से,
और उस भरोसे से
कि सामने वाला हमेशा रहेगा।

वो मेरी बात नहीं मानती
मगर मेरी मौजूदगी पर
उसे पूरा भरोसा है।

और शायद यही
हमारे रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात है—

वो दुनिया के सामने
कितनी भी बड़ी हो जाए,
कितनी भी आत्मनिर्भर बन जाए,

मेरे सामने
वो हमेशा वही रहेगी

मेरी छोटी-सी बहन,
जो मेरी एक बात नहीं मानेगी,
लेकिन जब दुनिया उसे उलझाएगी,
तो सबसे पहले पूछेगी l
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35 मिनट पहले

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