स्त्री होकर स्त्री को समझा,
आँखों में आँसू जब छलका,
निर्मोही बादल बनकर बरसा,
आँगन की तुलसी को सींचा।
साध्वी-सा जीवन जीकर,
एक सीधी-सी रेखा खींची।
स्मृतियाँ सदैव बनती रहीं,
उर में दीपक सदा जलता रहा।
मन-मस्तिष्क में चेतना का
अंतर्द्वंद्व चलता रहा।
प्रश्न पर प्रश्न पूछती रहीं,
कौंधकर बिजली चमकती रही,
स्त्री की अस्मिता को
स्वर देती रहीं।
“कितनी करुणा कितने संदेश,
पथ में बिछ जाते बन पराग।”
“बीन भी हूँ मैं तुम्हारी,
रागिनी भी हूँ!”
“मैं नीर भरी दुःख की बदली,
परिचय इतना इतिहास यही।”
जैसी प्रसिद्ध पंक्तियाँ
हृदय में गूँजती रहीं।
नीहार, रश्मि, नीरजा,
सांध्यगीत में सजती रहीं।
छायावाद की सुदृढ़ स्तंभ थीं,
आधुनिक युग की मीरा,
वीणापाणि की साधना में
विरह-वेदना, करुण-भावना थी।
दीपशिखा, यामा, अग्निरेखा ,
अतीत के चलचित्र में झाँकती,
स्मृति की रेखाएँ
उभरती रहीं।
पथ के साथी, मेरा परिवार,
गिल्लू , श्रृंखला की कड़ियों में
नारी-मुक्ति, स्त्री-विमर्श पर
प्रखरता के साथ
विचार लिखती रहीं।
“शिक्षा से होगी पहचान,
आत्मनिर्भर बनो!”
जग को दिया संदेश—
रूढ़ियों को तोड़ो!
विदुषी, प्रयाग की गौरव,
महीयसी महादेवी जी की
पुण्यतिथि पर
‘चेतना’ का शत्-शत् नमन।
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