इन तन्हाइयों में ये कौन आवाज देता है मुझे।
अजनबी रास्तों में ये कौन पुकारता है मुझे।।
प्यासा ही भटकता रहा हूं मैं इन सहराओं में।
ये कौनसा है समन्दर जो पास बुलाता है मुझे।।
रहा दूर ही मैं इन हसीन ग़मों से हरदम ही।
मुहब्बत की शमां से कौन रोशन करता है मुझे।।
माना कि कुछ आरजू दफ़्न रही है सीने मे मेरे।
हाँ इक ये ज़लज़ला सा महसुस होता है मुझे।।
ग़मों की तकदीर में उसने मेरा नाम लिख दिया।
फिर ये कौन सा ग़म है जो फ़ना करता है मुझे।।
सकून की चाहत मे भटकता रहा महफ़िलों में ।
और घर का आईना गुमसुम सा देखता है मुझे।।
बहुत ज़ख्मों को मयखाने मे दफ़्न किया गुमनाम।
पैमाना लिए वो मेरा साकी फिर बुलाता है मुझे।।
- बृज मोहन सिंह बिष्ट
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