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सिर्फ साल बदला है बातें वही हैं

                
                                                         
                            क्या बदलेगा जाते हुए साल के साथ,
                                                                 
                            
और आते हुए साल के साथ,
मैं, तुम या अपनी मोहब्बत,
कुछ भी तो नहीं,
बेशक उम्मीद है बदले कठिनाईयां,
तेरे मेरे मिलन में,
अपनी मोहब्बत के दरमियाँ,
दो दिलों की नहीं,
बस समय की,
उम्मीद है,
क्योंकि सब बदलता है समय के साथ,
अपनी मोहब्बत भी तो बदली,
अजनबी से गहरी,
दोनों दिलों में,
तारीख बदलेगी,
इतिहास होता गवाह,
तेरी मेरी साँसें बस गवाह,
हर बात की,
तेरी, मेरी और मोहब्बत अपने बीच,
सालों की,
हर पल में ना जाने,
कितने साल समेटे हुए...

बृजेश कुमार '  


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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