पहाड़ों की गोद में, जहाँ शांति सोया करती थी,
जहाँ नदियाँ लोरी गाकर गाँवों को जगाती थीं,
आज वही नदियाँ उफान में चीख रही हैं,
जैसे कह रही हों— "अब और मत छेड़ो हमें।"
पहाड़ों के आँचल में छिपी शांति अब टूट रही है,
जहाँ देवदार की खुशबू थी, वहाँ धूल उड़ रही है।
नदियाँ जो कभी जीवन की रागिनी थीं,
आज प्रलय की तान गा रही हैं।
ब्यास की लहरें, सतलुज का शोर,
रावी की चीख, हर घाटी का क्रंदन—
कहता है जैसे प्रकृति ने आँखों से आँसू नहीं,
आग बरसानी शुरू कर दी हो।
बारिश, जो कभी धरती को आशीष देती थी,
आज शाप बनकर गिरती है—
बादल टूटते हैं तो लगता है
मानो आकाश ने अपने घाव पहाड़ों पर खोल दिए हों।
ढहते मकान, बहते पुल,
सड़कें जो गुम हो गई नदियों में—
सब गवाही दे रहे हैं कि
हमने ही अपने घर की नींव खोदी है।
बारिश, जो कभी गीत थी खेतों के लिए,
अब आकाश से टूटता शाप बनकर गिरती है,
बादल फटते हैं तो लगता है
मानो स्वर्ग की छत ही धरती पर बिखर पड़ी हो।
चार-लेन सड़कों की दौड़ में,
होटलों और मशीनों की भूख में,
पेड़ कटे, पहाड़ छिले,
हर ढलान लहूलुहान हो गया।
ग्लेशियर भी अब मौन नहीं—
कभी झील बनते हैं, कभी टूटकर गाँव बहा ले जाते हैं।
हिमालय की ठंडी चुप्पी अब
तूफ़ान की गरज में बदल रही है।
विकास के नाम पर छेड़ी गई छाती,
कटी हरियाली, छलनी हर ढलान—
यह घाव हमने खुद दिए हैं कुदरत को,
और अब कुदरत जवाब दे रही है।
बुज़ुर्ग कहते हैं—
“पहाड़ गुस्से में हैं।” प्रकृति गुस्से में हैं
और सचमुच, हर दरार, हर भूस्खलन, हर बहाव
कुदरत की करुण पुकार है।
उनकी हर दरार, हर भूस्खलन, हर बहाव
एक चेतावनी है—
कि हमने बहुत लिया, अब लौटाने का समय है।
-बीएस शैट्टी चेत
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