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शांति की थकी हूई तलाश

                
                                                         
                            शांति के लिए उसने अनवरत श्रम किया,
                                                                 
                            
पर मन भीतर से अशांत ही रहा।
वह सुबह को प्रार्थना करता,
शाम को खुद से लड़ता।
दिन भर समझौतों की सिलाई,
रात में सवालों की कटाई।
चुप रहकर भी बहुत कुछ कहा,
बोलकर भी अक्सर चुप ही रहा।
रास्ते बदले,
मंज़िल वही रही।
धैर्य का दीप जलाया,
हवा ने दिशाएँ बदल दीं।
हर जीत के नीचे हार का काँटा,
हर हार के नीचे सीख का बीज।
वह मुस्कुराता,
पर भीतर लहरें उठतीं।
घर के आँगन में शांति का पेड़,
पर जड़ों में बेचैनी का सागर।
दाने बोए प्रेम के,
उगे तर्क के कांटे।
रिश्तों को सहेजा,
शब्दों से उन्हें घायल भी किया।
उसने स्वयं को टटोला,
पर खुद को छू नहीं पाया।
उसने सबको समझाना चाहा,
पर खुद से कभी बात न की।
वह नियम लिखता,
और रात में नियम तोड़ देता।
वचन देता,
फिर यादों में खो जाता।
जीवन एक लंबी सीढ़ी लगा,
जिसके पायदान काँपते थे।
उसने भीतर एक नगर बसाया,
और दरवाज़े सब ओर खोल दिए।
लेकिन हवा में विवाद था,
और खिड़कियाँ शोर से भरी।
वह संसार को शांत देखना चाहता,
और अपने भीतर तूफ़ान पालता।
उसने युद्ध रोकने के गीत गाए,
पर आवाज़ में तलवार की धार थी।
वह बच्चों को सपने देता,
खुद बुरे स्वप्न सँजोता।
उसने दया सीखी,
पर खुद पर कठोर रहा।
समय की धूल ने चेहरे ढाँके,
और आँखों से चमक गई।
वह आशा के कण चुनता,
निराशा की गठरी ढोता।
उसने मंदिरों में दीप रखे,
और मन में अँधेरे।
वह संतों के शब्द सुनता,
पर भीतर की आवाज़ टाल देता।
उसने समरसता के पुल बनाए,
मगर उनके नीचे दरारें।
उसने क्षमा माँगी,
पर खुद को माफ़ न किया।
हर कदम में संकोच,
हर ठहराव में पछतावा।
वह सादगी चाहता,
पर इच्छाओं की गठरी भारी।
उसने थकान को भी दुलार दिया,
और आराम से दूरी रखी।
जीवन की किताब में,
वह खाली पन्ने ढूँढता रहा।
हर उत्तर के पीछे,
नया प्रश्न उग आता।
वह अपने ही दिल का मेहमान,
अपने ही घर में अजनबी।
उसने सच्चाई के दीप जलाए,
और छाया से डरता रहा।
उसने सत्य का स्वाद चखा,
मगर आदत झूठ की रही।
वह कल का सपना बुनता,
आज को गिरवी रख देता।
उसने मौन के लिए तप किया,
और अंततः शब्दों में खो गया।
उसने मित्र बनाए,
और शंकाएँ भी।
उसने राह दिखाई,
और खुद भटकता रहा।
शांति उसके हाथों तक आई,
मगर हथेलियाँ काँप गईं।
उसने अवसर पकड़ा,
और संदेह छोड़ न सका।
समय ने उसे बुलाया,
उसने देर कर दी।
मन ने पुकारा,
उसने बहाना कर लिया।
उसने दुनिया बदलने की ठानी,
खुद को बदलना टाल दिया।
वह पहाड़ बनना चाहता था,
पर मिट्टी की तरह बिखरता रहा।
उसने प्रेम की नदी खोजी,
और डर की नाव चलाई।
उसका चेहरा शांत,
उसकी नींद उलझी।
उसने दया का वर्णन किया,
पर क्रोध की भाषा बोली।
वह पुल पर खड़ा रहा,
और दोनों किनारों से डरता रहा।
उसने सुबहों को पकड़ा,
रातों को छोड़ न पाया।
उसने आकाश नापा,
मगर पाँव पर जंजीरें।
उसने सपनों को पंख दिए,
पर उड़ने का अभ्यास न किया।
उसने कानून गढ़े,
और आदतें नहीं बदलीं।
वह सबका हित चाहता,
पर स्वयं की पीड़ा अनकही।
उसने स्मृतियों को सहेजा,
और वर्तमान खो दिया।
उसने दीपक बदलते रहे,
पर तेल नहीं।
उसने शब्द बदले,
मगर मंशा नहीं।
उसने चेहरा धोया,
पर आँखें नहीं।
उसने दर्पण टांगे,
खुद को निहारा नहीं।
वह दूर-दूर तक शांति का दूत,
लेकिन भीतर का यात्री अकेला।
वह हार कर भी समझदार न हुआ,
जीत कर भी निश्चिंत नहीं।
उसने झुकना सीखा,
पर भीतर अकड़ छुपी रही।
उसने थामे हाथ,
मगर विश्वास ढीला।
उसने खेत जोते,
पर बीज नहीं बदले।
उसने घर सजाया,
पर दिल को नहीं।
उसने राग छेड़े,
पर सुर नहीं साधे।
उसने प्रश्न पूछे,
उत्तर सुनना मुश्किल पाया।
वह पुल भरना चाहता,
पर खाई को प्यार करता रहा।
उसने क्षितिज को दोष दिया,
और कदम रोक लिए।
उसने समय से बहस की,
और पल खो बैठा।
उसने घाव छुपाए,
और मरहम बाँटता रहा।
उसने नियम कड़े किए,
पर इरादे मुलायम रखे।
वह दुनिया को शांत चाहता,
पर दिल का शोर ही प्रिय लगा।
उसने सोचा — कल,
और आज गुजर गया।
उसने जीवन को साधना कहा,
और उसे शिकायत बना लिया।
वह सत्य के निकट आया,
और लौट गया।
उसने ईश्वर को पुकारा,
और अपने भीतर झाँका नहीं।
उसने मित्रों में आश्रय ढूँढा,
और स्वयं से भागा।
उसने पुलों पर दीप जलाए,
और नाव जला दी।
उसने हर दर्द को नाम दिया,
मगर कारण नहीं देखा।
उसने बीजों पर संदेह किया,
और मिट्टी को दोष दिया।
उसने शाखें काटीं,
पर जड़ें अनछुई रहीं।
उसने पर्व मनाए,
और अर्थ खो दिया।
उसने भोर के लिए गीत लिखे,
और रात में रोया।
उसने प्रतिज्ञाएँ लिखीं,
और पुरानी आदतें थामी रहीं।
उसने मन से युद्ध किया,
मन ही विजेता बना।
वह थककर बैठा,
और बेचैनी साथ बैठी।
उसने फिर शांति का स्वप्न देखा,
और स्वयं को आमंत्रित किया।
उसने नज़र भीतर मोड़ी,
और पहली बार सन्नाटा सुना।
उस सन्नाटे में बीज था,
बीज में एक पेड़।
पेड़ में घोंसला,
घोंसले में साँस।
उसने साँस को देखा,
और उसमें ठहराव।
ठहराव में एक दयालुता,
दयालुता में एक प्रकाश।
प्रकाश में रास्ता,
रास्ते में साहस।
साहस में क्षमा,
क्षमा में विश्रांति।
विश्रांति में जागृति,
जागृति में सहजता।
सहजता में शांति,
शांति में वह स्वयं।
अब उसने प्रयास छोड़ा नहीं,
पर प्रयत्न का भार छोड़ा।
अशांति घुली,
और शेष रह गया — शांत समय।"
 
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7 महीने पहले

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