रात की उस निशाचरी से भयभीत,
नींद को त्यागकर
मैं जागता पड़ा हूँ।
मूर्खता!
जिस रात से डरता हूँ,
वही तो
मेरी पलकों पर
नींद बनकर उतरना चाहती है।
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