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मिठास समझकर ढोता रहा

                
                                                         
                            उम्र भर
                                                                 
                            
मिठास ढोता रहा मैं,
जैसे मेरी छाती के भीतर
शहद का कोई छत्ता
दिन-रात बन रहा हो।

लोगों ने माना
कि मैं मीठा हूँ।
और मैं भी
उनकी इस भूल को
अपनी उपलब्धि समझता रहा।

सच?

मेरे भीतर
शहद नहीं था,
सिर्फ़ साफ़ दिखाई देता
एक साधारण-सा
मिलावटी पानी था।

मगर अभिनय इतना सधा हुआ था
कि झूठ भी
मिठास जैसा लगने लगा।

दूसरों को क्या दोष दूँ?
मैंने ही तो
अपने चेहरे पर
मधुरता का मुखौटा
इतनी देर तक लगाए रखा
कि एक दिन
आईने ने भी
मुझे पहचानने से इनकार कर दिया।

अब कभी-कभी
अपने ही होंठों से
अपना स्वाद पूछता हूँ।

जीभ पर उतरती है
एक अजीब-सी कड़वाहट—
और भीतर से कोई कहता है:

दूसरों की प्यास बुझाते-बुझाते
तुमने अपने लिए
एक बूँद भी नहीं बचाई।

क्या विडंबना है!

जिसे लोग
मधुर समझते रहे,
वह भीतर से
अपने ही लिए
कड़वा था।

और जिसे मैं
जीवन भर
मिठास समझकर ढोता रहा,
वह शायद
सिर्फ़ एक पारदर्शी छल था—

इतना पारदर्शी
कि उसमें
मेरा अपना चेहरा भी
साफ़ दिखाई देता रहा,
पर मैं
उसे पहचान नहीं पाया।
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2 घंटे पहले

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