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झूठ का स्वाद चखती जीभ

                
                                                         
                            झूठ का स्वाद चखकर
                                                                 
                            
मेरी जीभ भी नींद में डूब रही है;
अब प्रतिवाद करने में असमर्थ है।

अन्याय ही इस दुनिया पर राज करे,
अत्याचार ही अपना ताज पहने;
मेरे अस्तित्व की हड्डियों में
बस एक क्षणिक चुभन
ही शेष रह गई है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
15 घंटे पहले

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