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मन की ऋतुएँ हज़ार

                
                                                         
                            ये ज़िन्दगी के कष्टों को यूँ तोड़ व मरोड़कर
                                                                 
                            
यह ज़िंदगी की कीमत को मैं अब जो मोलकर
समझने लगा हूँ निखरने लगा हूँ
बरस-सा गया बस बरसने लगा हूँ

सावन की काली घटा में कली-सा
मायूस ही था इंतज़ार में हमेशा
होगा उज्यारा छटेगी घटा ये
सूर्य-किरण में ये चमकेगी माया
चाहत ये थी पुरे सावन में मेरी
सूर्य का दामन व ग्रीष्म की छाया
कालगति-संग प्रभाकर भी बरसे
छायी जो धुप दिल-हमरा भी हर्षाया
खेल था ये कुछ दिनों का तुम समझो
ग्रीष्म तो मानो अंगारे ले आया
मन ये न भावे दिवाकर की आभा
रवि की छाया में अब जो ख्याल आया
बारिश का पानी वो सावन की काया

सोचा ये था मैंने जो कभी ना 
मन ये न बस्ता कभी भी कही न
मन ये जो माने पत्थर को मनोहर
हीरा वो जैसे देखा हो कभी न
अब जो मैं ये समझने लगा हूँ
बरस-सा गया बस बरसने लगा हू

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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