आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मूक सहमति

                
                                                         
                            किसी को पाना नहीं उसका साथ होना काफी है
                                                                 
                            
पास ना होकर भी हर पल अहसास होना काफी है।
जिसके माथे की इक सिकन व्यथित कर जाए मन
जिसकी हर अनकही बातें भी समझ जाए ये मन।
जो आंखों से बोले और आंखें सुनने लगे
बंद आंखें भी जब उसका दीदार करने लगे।
दिल, अवगुण से भी उसके प्यार करने लगे
जिसकी मुस्कान से जिंदगी संवरने लगे।
जिसका हर गम अपना और खुशियां सबकी लगे
जिसकी सूरत देख सुबह हो और रात झपकी लगे।
जो सबका हो कर भी मुझ में शेष हो
मेरी हर इक उपलब्धि से भी विशेष हो।
हर अवसर में जो खास हो
जिस पर अटूट विश्वास हो।
ऐसे निष्ठा प्रेम समर्पण को
सदा प्रभु का आशीर्वाद हो।
-बीना राजन मिश्रा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर