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खुद को ना तुम खो देना, हासिल करते-करते

                
                                                         
                            जब तुम यह कहते हो ना,
                                                                 
                            
हो जाएगा परेशान मत हो, मैं हूं ना।
तब हर दुष्कर चाह मुट्ठी में लगती है
हर उलझन मीठी घुट्टी सी लगती है।
हर बार तुम मेरे आग्रह का मान रख लेते हो
बिना जताए आदेश के समतुल्य कर देते हो।
तुम गलत नहीं, बस बाध्य हो अपने पद से
कशमकश यही, बौने ना हो जाओ अपने कद से।
गरल कंठ में धारण करना इतना भी आसां नहीं
हृदय चोटिल होता है पर कहीं कोई निशां नहीं।
बंधन में हो पर बाध्य नहीं
कठिन है पर असाध्य नहीं।
खुद को ना तुम खो देना, हासिल करते-करते
सब कुछ खाली ना कर देना, सब भरते भरते।
हिम्मत खुद की तुम, खुद की परछाई तुम्हीं
ग़ज़ल खुद की तुम, खुद की रुबाई तुम्हीं।
-बीना राजन मिश्रा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

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