खुद को सीमाओं में बांध लूं ऐसी कोई मजबूरी नहीं
औरौं की शर्तों पर जिऊं ये भी तो कोई जरूरी नहीं।
परिस्थितियां मेरी सीमा नहीं, सदा शुरुआत रही है
प्रारब्ध की तबाही भी नवजीवन की सौगात रही है।
औरों की खींचीं लकीरों पर अब मुझको चलना नहीं
कई सांचों में ढलते आए हैं अब मुझको ढलना नहीं
समय की भट्टी में तपे हैं हम कुंदन से
ना रहा मोह हमें किसी भी बंधन से
ना बांधों हमें सीमाओं में रहने दो स्वतंत्र जरा
तिनका तिनका नीड़ गढ़ा बूंद बूंद गागर भरा
समृद्ध मेरा कल रहा, वर्तमान क्यों भव में छोड़ दूं
समय के पटल पर, भविष्य की क्यों राह मोड़ दूं
अंत नहीं ये आरंभ है काल के कपाल पर
नैनों में फिर दीप्ति वही तेज फिर भाल पर
चाहिए जब साथ तो सारथी बनो
जलना ही पड़े जब तो आरती बनो
मंजिल जब एक है राहें भले हों अलग
तुम राह अपनी चलो हमारी राह विलग
-बीना राजन मिश्रा
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