का बतलाई विरमित होके, कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
रहल नोकरी,जानत रहुए,
सऊंसे शहर मोहल्ला।
अब त कोई परिचित भी,
मुश्किल से भेटाला ॥
ट्वीटर पर कुछ ट्रैंड कराके,फेसबूक पर फ्रेंड बनाके।
पहचान बचावे के खातिर, पर्यत्न करत बानी॥
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
सोचत रहनी ना बुढ़ाइब,
जइसन बानी ओइसने रह जाइब
मेडीक्लेम से काल डरऽल रही
रोब-दाब , भौकाल बनलऽ रही
टुटत गुमान के, पेवन साटत बानी।
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
महफिल रहे कबो रात भर सजत।
अब बंद कुण्डी होला साते बजत॥
एकेले बैठ के समय हम काटी।
कभी मांछी मच्छर के डाँटी ॥
टकटकी लगाई,टकटक ताकी,टरटर करत बानी।
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
होत भिनुसहरे टहले जाईं
पूरनकठ परिचित, जास भेंटाई
बिसुरल ऐंठन हमार इयाद जेआई
दूरे से उ मुंह बिचकाई
'प्रणाम सर' के बदले, 'मरल ना सार' सुनत बानी।
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
अब त चिनीया रोग बा लागल।
रक्तचाप बा ऊपर भागल॥
धड़कन के भ गईनी रोगी।
यम के डर से भईली योगी॥
एह नाक कबो वोह नाक से,भाँती खिंचत बानी ॥
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
जाने क़हवा नींद बा भागल।
रहिना रात - रात भर जागल॥
ठीक राम के बेरा मे।
रही निरोग एह फेरा मे॥
रखें खातिर निरोगी काया, लचरीये टहलत बानी।
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
बुढ़ारी के अधमुआ शरिर।
झटपट चलहू मे जाई गिर॥
पूरनकठ दर्द कबर जाला ।
आंखिन मे आँसू भर जाला॥
मन भींच भींच,तन खींच खींच केहुंग डगरत बानी॥
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
बात कइले रहे ,मन मे घर
मरला से लागेला डर
अस्पतालन से बटोरी दवाई।
डाक्टरन के सलाह पर भाई॥
खाये के पहिले,प्रोटीन,सुगर गिनत बानी।
का बतलाई विरमित होके कैसे जियत बानी।
दवाई संगे, तन्हाई के, हलाहल पियत बानी।।
-बिजय बहादुर तिवारी
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