दाह संस्कार हेतु पार्थीव शरीर
आते जहां गंगा के तीर
विदाई की ढुंढते, "अपने" बाट
अंतिम प्रेम स्थल,मणिकर्णिका घाट
जब तक जल न जाती देह
आत्मा की नहीं, टुटती नेह
जलकर बन जाता जब भस्म
मिट जाती, दुनियावी रस्म।।
'वामा वर्जित' महाश्मशान
विधि की टुटे नहीं विधान
प्राण हर, बनाती लाश
चिताएं करती उसे निराश ।
मौत की देवी,सच्ची प्रेमिका
रुह हर लेती, मेरी नायिका
प्रेम आलिंगन ऐसा मजबूत
दुसरों के लिए बनते अछूत।
रख ली 'अपनों' ने कमाई
चिता जलाकर राख बनाई
मृत्यु, वफ़ा की रस्म निभायी
केवल नंगी लाश उसे भायी।
जो मृत्यु से मिला एकबार
आता नहीं, छोड़कर प्यार
उसके हुस्न का ऐसा जोर
जा रहे खिंचें सब उसी ओर।
आग में जले,या ओढ़ ले मिट्टी।
छोड़ना है सब,ज्यों वो लिपटी।
होते समाधिस्थ जीवन-मुक्त
जलते देह जो रहे अमुक्त।
मृत्यु,सांस का टुटना आस टुटे मोक्ष
स्वसाक्षी मोक्ष है सर्वसाक्षी अमोक्ष,
आवागमन से परे,होते जीवन-मुक्त
चौरासी मे भ्रमित,आत्माएं अमुक्त।
देह मोह भंग,देह शुद्धि प्रकिया
सोलह संस्कारों की अंतिम क्रिया
कर्मों से मुक्ति की मंच मणिकर्णिका
'पुनःशच पंचतत्व प्रेषक', श्रीपर्णिका।।
-बिजय बहादुर तिवारी'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X