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कसम और तू ..

                
                                                         
                            वक़्त भी कम है, ज़िंदगी भी कम,
                                                                 
                            
क्यों न आज सारे गिले-शिकवे भूल जाएँ हम।
पता नहीं किस मोड़ पर फिर रास्ते जुदा हो जाएँ,
पता नहीं फिर कभी मिलें… या बस यादों में रह जाएँ।

जो बीत गया, उसे आज जाने देते हैं,
कुछ अधूरी बातों को पूरा हो जाने देते हैं।
तुम मुझे हराना चाहती हो,
मगर मैं तो पहले से ही हारा हुआ हूँ…
तुमसे नहीं, उस एक वादे से,
जो तुम्हारे नाम से नहीं…
मेरे बेटे की कसम से बंधा हुआ है।

बहुत बेबस हूँ उस कसम के आगे,
वरना दिल आज भी वहीं ठहरा है,
जहाँ आख़िरी बार तुम्हें अपना कहकर
मैंने खुद को तुमसे दूर किया था।

इस बार बस इतना करना…
एक संदेश अपनी तरफ़ से कर देना।
मैं जवाब देने का हक़ शायद न रखूँ,
मगर तुम्हारा एक पैग़ाम
मेरी ख़ामोशी को उम्र भर याद रहेगा।

तुम मुझे हरा भी दोगी तो क्या,
मैं तो तुम्हारे सामने हारकर भी जीत जाऊँगा।
तुम्हें हराकर अगर खुद को जीत भी गया,
तो सच मानो…
तुम्हें खोकर मैं फिर हार जाऊँगा।

इसलिए आओ, जीत-हार का हिसाब छोड़ दें,
जो कुछ पल बचे हैं, उन्हें साथ जी लें।
कल किसने देखा है…
हो सकता है आज की ये ख़ामोशी
कल हमारी आख़िरी याद बन जाए।

बस इस बार तुम एक कदम बढ़ा देना,
मैं सारी दूरियाँ भूल जाऊँगा।
तुम मुझे जीतने का मौका देना…
मैं तुम्हारे सामने फिर से हार जाऊँगा।

- भूपेंद्र कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

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