तेरी जीत पर हमने आँसू बहाए थे,
तेरे लिए ही हमने ख़्वाब सजाए थे।
तेरे लिए ख़ुद के अरमान जलाए थे,
तूने ही फिर क्यों जाल बिछाए थे?
तेरे भरोसे हमने सपने सँवारे थे,
तेरे लिए छोड़े कितने ही किनारे थे।
धोखा दिया तूने, ये कैसा सिला दिया?
जिसको अपना माना, उसी ने रुला दिया।
नासमझ! नाले-समंदर हमसे उलझे थे,
ख़ुद को शेर बताकर गीदड़ बन बैठे थे।
ख़ुद को मसीहा कहता, दिल तेरा काला,
याद आएँगे गुनाह, जब जपेगा माला।
बिगाड़ न पाएगा, साथ है ऊपरवाला,
सच्चे जिगरवाले को तूने कम आँका।
वक़्त की अदालत में हिसाब होगा सारा,
एक दिन रह जाएगा तू जग में अकेला।
कर न सकेगा तांडव, सुन ले ऐ दानव,
तेरे सामने सीना ताने खड़ा है मानव।
ताक़त के नशे में तू भूल गया इंसानियत,
एक दिन तुझे ही याद आएगी अपनी हैवानियत।
एक बार भरोसा तोड़ा है तूने,
कितने दिलों को झकझोरा है तूने।
ज़रा देख अपना चेहरा आईने में,
क्या नज़र आता है अपने ही सीने में?
ख़ुश तो तू भी नहीं, चाहे लाख छिपाए,
बेगाने बनकर कितने ही दिन बिताए।
अभी भी वक़्त है, ऐ दोस्त, सुधर जा,
अपने गुनाहों से लौट, ज़रा सँवर जा।
नफ़रत की राहों में सुकून नहीं मिलता,
झूठ के सहारे कभी मान नहीं मिलता।
अब भी सँभल जा, यही वक़्त का इशारा,
वरना पछतावे में कटेगा जीवन सारा।
- भुनेश्वर अनंत
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