सावन महीने में रिमझिम बारिश,
की फुहारें मन को मोहतीं।
ठंडे-ठंडे छोटे कण बरसें मोती,
नदियाँ करतीं कल-कल,
झरने करते झल-झल।
भीगा जो तन,
झूम उठा मन।
अरपा, पैरी, महानदी का है संगम,
श्यामल जल बहे, झूमे उपवन।
हिलोरें मारतीं, चमके जैसे कुंदन,
छत्तीसगढ़ महतारी के चूमें जैसे चरण।
हंस भी गोता लगाए,
ऐरी भी रिझाए।
कहे! जीवन यही है,
मुझ-सा नहीं कहीं है।
लहलहाती फसलें कहतीं,
देख मौसम कितना सुहाना।
समेटे अपनी गोद में,
कितनी अमर कहानी।
सोना, चाँदी, हीरा, मोती,
सब हैं मेरी गोद में,
कहती लता, गर्व से अपनी,
प्रकृति के इस आँगन में।
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