नज़दीकियाँ बढ़ती गईं, बेताबियाँ होती गईं
नज़दीकियाँ बढ़ती गईं,
बेताबियाँ होती गईं।
तेरे चाँद-सा मुखड़ा,
संगमरमर-सा बदन,
तुझे देख होती है मन में चुभन ।
मेरी धड़कन तुझे देख रुक जाती है,
हर पल याद तेरी सताती है।
एक सुंदर-सा नग़मा
मेरी ज़ुबान से निकलकर आती है।
तुझे देख हो गया मैं दीवाना,
एक दिन तू होगी मेरी,
चाहे कुछ भी कहे ज़माना।
मैं तुझमें समा जाऊँ,
तू मुझमें समा जाना।
बस ज़िद ही है,
एक दिन तुझे ही पाना।
बस रात-दिन तुझे ही निहारता रहूँ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में खोता रहूँ।
तेरा उलझा-उलझा, बेचैन चेहरा,
ढूँढ़ता मुझे हर पल।
मन है ख़ामोश तुझे देखकर,
आँखों से झरना बह रहा कल-कल।
इतनी बेताबियाँ हैं मुझे
तुझे देखने के लिए,
तेरे नूरानी चेहरे को
अपनी आँखों में सेंकने के लिए।
- भुनेश्वर अनंत
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