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कहाँ रखूँ पाँव, अब तो पतवार भी नही हाथ में ।

                
                                                         
                            एक दिन तो पहुँचेगा मेरा हुनर उन तक,
                                                                 
                            
थाम लेंगी दिल से, पूछेंगी कहाँ थे अब तक।
बड़ी देर कर दी जानेमन आने में,
यादों के घरौंदे में मेरा सपना सजाने में।

चले थे हम तो तुझे नाकारा समझकर,
धोखा खा गए तुझको बावरा समझकर।
आग लगा दी तूने दरिया में,
नींद कहाँ, चैन भी लुट गया इन रतियों में।

चाँद भी देखकर शरमा जाए,
कैसे कहूँ, वो आ भी जाए।
मेरी नैया डूबी बीच मँझधार में,
न किनारा मिला, न सहारा दरिया में।
कहाँ रखूँ पाँव, अब तो पतवार भी नही हाथ में ।

-भुनेश्वर अनंत ।
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22 घंटे पहले

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