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सोचता हूँ मैं बैठा, दुनिया है कितना भाग रही,

                
                                                         
                            कितना सुकुन है, जिंदगी मे,
                                                                 
                            
ना किसी के आगे निकलने की जल्दी,
ना किसी के आगे निकल जाने पर खलती,
है कलम हाथ में, दीये-सी जलती।

कागज़ की नाव बनाकर ना चढ़ना पतवार में,
मंज़िल का क्या है प्यारे!
मिल ही जाएगी, कर ले खुद पर ऐतबार ऐ!

सोचता हूँ मैं बैठा, दुनिया है कितना भाग रही,
आधा सोती, आधा जाग रही।
मुख की हँसी, आँखों का चैन,
चेहरे का सुकून कहाँ खोती जा रही ?

ऐ मेरे परदेसी! थोड़ा-सा बैठ ले,
बरगद की छाँव में जुड़ा ले,
एक बूँद अमृत तो पी ले,
एक पल ज़िंदगी के सुकून से तो जी ले।

नीली छतरी का कमाल कहाँ देखा,
चींटी से हाथी तक का जीवन देखा।
भेजा है ऊपरवाले ने,
तो कहीं तो होगा खाने का ठिकाना।

ना ज़िद पाल,
कर ले सेवा मानवता की,
सत्तर-अस्सी की तेरी उमर,
क्यों बनाता है पहाड़?
बन जा अपने जीवन की खूद कहार।
- भुनेश्वर अनंत 
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