भाषण से पेट नहीं भरता साहब,
काम करना पड़ता है।
बच्चों की खुशी के लिए
जान डालना पड़ता है।
तपती दोपहरी में सूरज की आग में तपना पड़ता है,
पेट काट-काटकर अगले दिन के लिए बचाना पड़ता है।
कागज़ों में तो सब अमीर दिखते हैं,
यहाँ तो खड़े-खड़े ज़मीर बिकते हैं।
लोग इसे राजनीति कहते हैं,
सैलाबों की तरह वादे बहते हैं।
एक बार ज़मीं पर उतरकर देख,
बस दो कदम चलकर देख।
महलों से तो ज़माना अच्छा लगता है,
एक बार बारिश की बूँदों में
लकड़ी का गट्ठर उठाकर तो देख।
बातें कहना, बातें बनाना आसान है,
एक बार किसान बनकर तो देख।
लहलहाती फ़सलों की हालत,
बेमौसम बरसात की मार तो देख।
पेट नहीं भरता साहब,
दो रुपये के मुआवज़े में,
एक बार भूखा रहकर तो देख।
- भुनेश्वर अनंत
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