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एक ! फरिश्ता

                
                                                         
                            बैठा था मायूस, सारे दरवाजे हो गए थे बंद,
                                                                 
                            
अपनी ही नजरों में गिरा था, फैल रही थी मन में गंध।

सूझ नहीं रहा था कुछ, तड़प रहा था मन,
एक फरिश्ता आया, बोला—
“तुझे क्यों हो रही है जलन?”

मैंने कहा—दुनिया ने धोखा दिया,
लगी आग अंग-अंग में।
उसने कहा—
“खुद की नजरों में मत गिर,
दौड़ने दे खून रग-रग में।”

उफनने लगा मेरा बदन,
दौड़ने लगा मेरा तन।
फरिश्ता बोला—
“शाबाश बेटा!”
देखकर मुझे हुआ वह मगन।

नई ऊर्जा, नई शक्ति का संचार हुआ,
फिर से जीने का मन तैयार हुआ।
नजरें आसमान की ओर उठाईं,
मंजिल को खोजने लगा मैं।

तभी फरिश्ता बोला—
“खुद की नजरों में कभी मत गिरना,
यही बात याद रखना हर दम।”
तू है ना किसी से कम।

दुनिया आज लगने लगी बड़ी खूबसूरत,
कई दिनों से नहीं देखी थी ऐसी सूरत।
एक फरिश्ते ने बदल दी मेरी तस्वीर,
अब नहीं चाहिए मुझे किसी की जागीर।

आज बैठा हूँ, सूरज को निहारता,
जल रहा है वह जैसे कोई दीपक।
ऐ फरिश्ते, तूने बना दिया मेरा जीवन,
आज लगने लगी मुझे अपनी कीमत।

आसमान की उन बहारों में,
मैं उड़ता हूँ बनकर पंछी।
फरिश्ते की बात—
“खुद की नजरों में मत गिरना,”
आज लगती है कितनी सच्ची।

एक मरे हुए इंसान में फूँक दी जान,
ऐ फरिश्ते, आज है तुझे सलाम।
आज बढ़ रहा है मेरा मान,
अब न करूँगा कभी अभिमान।

-भुनेश्वर अनंत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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