जीवन के हर मोड़ पर वह साथ थीं मेरे,
अभी कल ही की तो बात है
उनके हाथों में मेरा हाथ था, वो मुलायम, भीना-सा स्पर्श कैसे भूल सकती हूं मैं भला
हमारा साथ, मेरे विवाह के बाद से ही शुरू हुआ था
हमने कभी कुछ सोच कर रिश्ता नहीं निभाया
दोनों कभी एक, दूसरे की भावनाएं समझते
तो कभी नासमझ बन वाद-विवाद भी कर लेते
मुझे भावनात्मक या शारीरिक कुछ भी तकलीफ होती तो मैं उनकी गोद में अपना सर रख, जी हल्का कर लेती
ऐसे पलों में वह मेरा पूरा ध्यान रखतीं
मैं भी उन्हें हर पल खुश रखने की पूरे दिल से कोशिश करती
उन्हें सजना संवरना पसंद था तो मैं, वह हर श्रृंगार लाकर देती जिसकी वह चाहत करती और मैं!!!!
मुझे बहुत श्रृंगार पसंद तो नहीं और मेरे जीवन साथी को भी ऐसी कोई चाहत नहीं
पर उनकी खुशी की खातिर हर रोज तो नहीं
पर वार त्योहार सज कर पूरा दिन उन्हें परेशान करती
कभी चूड़ियों की खनखनाहट सुनाती
तो कभी अपने गले का हार दिखा, उन्हें बहलाती
तो कभी साड़ी का पल्लू लहराती, इतराती, बलखाती
वह मेरी ऐसी हरकतों से कभी चिढ़ती तो कभी मुझे पास बैठा कर मेरा माथा चूम लेतीं
वह मुझ पर बहुत विश्वास रखतीं थीं
इसीलिए तो सारा हिसाब किताब मुझ पर सौंप निश्चिंत रहतीं थीं
मेरे साथ कभी स्कूटर से तो कभी कार में बिना डरे बिदांस घूमतीं
क्योंकि मुझे बाहर के कामों में, तो खुद को घर के कामों में, वे उस्ताद समझतीं
जिस कारण विचारों में मतभेद तो बहुत थे फिर भी दोनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके थे
दोनों के खाने-पीने के शौक लगभग एक से थे
बस रहन, सहन और बोलचाल के तौर, तरीके कुछ अलग थे
फिर भी वह मेरे बिना और मैं उनके बिना घर में अधूरे से थे
यह अहसास भी कई बार करा देतीं थीं, मुझ पर अपना हक जताकर
अब जब वह अलविदा कह गईं इस दुनिया से, एक अजीब सा ख़ालीपन सताता है
और वह मुझसे पूछतें हैं क्या सास के लिए भी भला कोई इतने आंसू बहाता है
-भावना नेवासकर
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