बिन तुम्हारे छूट रहा यहां एक सावन
चले गए हो तुम क्या परदेस
जैसे भूल गये तुम अपना देश
क्या तुम्हे पता नहीं चला ये सीजन
कि कर रहा इन्तजार यहां तेरा साजन
तुम्हे लग रहा परदेस कैसे मनभावन
बिन तुम्हारे छूट रहा यहां एक सावन
चारों तरफ फैल गई है अब हरियाली
बिन तुम्हारे दिल बड़ा है खाली-खाली
दीदार को तुम्हारे प्यासी है ये नैना
लौट भी आओ बीत ना जाये ये रैना
अम्बर उमड़ा धरती की भी बुझ गयी अगन
दीदार की आस ना मिटी जले अब तक ये मन
बरसी हैं बूंदे महक रहा है मन का आँगन
आ भी जाओ सनम बीत ना जाये ये सावन
भरत यादव
उत्तम गिरि कि चकिया
फाफामऊ प्रयागराज
उत्तर प्रदेश
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