बचा के रखें हुए सपनोंके बीज
नाव डूब रही है
समुंदर भी डूब रहा है
अंधेरे में।
अंधेरा डूब रहा है
इन्कारों की तूफ़ानियत में...
ज़मीन जलने को है
ज़मीन जलाने वाले हाथ
जल रहे हैं, या
आग ही ज़ला रही है
अपनेही हाथों से खुदको...?
रास्ते डूब रहे हैं,
भीड़ की गलतफ़हमी में
या रास्ते ही ज़ल पडे़ हैं
पछतावे की आग में?
क्या बरस रहा है
आसमान,बारिश या आदमी?
क्या बहता जा रहा है
हवा,चैन या भविष्य?
क्या अस्त हो रहा है
अंधेरा,समझदारी या अस्त?
किस की आ रही हैं आवाज़
पीडा़ की मृत्यु की या पैदा होने की?
मुंँह से शब्द नहीं फूटता
सुबह के।
पहाडो़ की लूली पडी़ हैं ज़बाने
चरागोंकी फड़फडा़ती है बाती
उगना मर गया हो जैसे
चुप्पी कब्रस्तान सी छलक रही है
इर्दगिर्द।
बादल उमड़ आयें है आसमान में
दुनिया के आक्रंदन के।
बरबादी समेट रही है खुद के ही
टुकडे़
थमना मंजूर नहीं ऐसे तूफा़न में।
मिट्टी में बह गया खून
हो गया है एकाकार
मिट्टीके साथ।
कड़कड़ाती और चमचमाती
मेडियों पे उग आये हैं
उम्मीदोंके पौधे।
बिना क्षितिज के ही
यहांँ उगना चाहता है
नया दिन
इन्सान की नयी सांँसों का
वर्तमान की कश्म़कशसे।
इसका मतलब सब ही
बह गया
मुर्दों की तरह
ऐसा नहीं।
मौत को उस की औकात
दिखानेवाली जमीन हैं
गांँवो में
और जमीन ने बचा के रख्खे हूए
सपनोंके बीज हैं।
--
मूल मराठी कविता-डाॅ.यशवंत मनोहर
हिंदी अनुवाद-भरत यादव
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