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शायद टूट रहा हूँ मैं

                
                                                         
                            मेरीी हिम्मत अब जवाब दे रही है,
                                                                 
                            
अंदर ही अंदर, शायद टूट रहा हूँ मैं।
इस दुनिया की बेतहाशा भीड़ में,
अकेला और पीछे छूट रहा हूँ मैं।
अपने ही वजूद, अपने ही किरदार को,
अब खुद ही पीछे छोड़ रहा हूँ मैं।
ऐ ज़िंदगी मुझे माफ़ करना,
कि अब लड़ना भूल रहा हूँ मैं।
यकीन करो, यह कोई फसाना नहीं,
सत्य है कि अब बिखर रहा हूँ मैं।
हज़ारों जंग जीतने के बाद,
आज खुद से ही हार रहा हूँ मैं।
वो शख्स जो बरसों पहले मुझमें था,
आज हर जगह उसी को ढूंढ रहा हूँ मैं।
हाँ, मैं वही एक 'योद्धा' था,
जो हर मुसीबत में चट्टान सा खड़ा रहता था।
लाख आंधियाँ आती थीं राहों में,
फिर भी जो हर हाल में मुस्कुराता था।
सच कहूँ तो वही एक 'ज़िंदा-दिल' इंसान था,
जिसे अब धीरे-धीरे खो रहा हूँ मैं।
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8 महीने पहले

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