आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दहाड़: रुकूँगा नहीं!

                
                                                         
                            लाख बार गिरूँगा नीचे, फिर उठ कर खड़ा रहूँगा मैं,
                                                                 
                            
पर हार मान कर कायर सा, इस मोड़ पर बैठूँगा नहीं।
तूफान आए या आए प्रलय, हर दर्द हँस कर सहूँगा मैं,
सौ बार भले गिरना पड़े, पर कदम पीछे खींचूँगा नहीं।
रुकूँगा नहीं, थकूँगा नहीं, अब पाँव आगे बढ़ाना है,
अंगारों पर चल कर मुझको, अपनी सोई किस्मत जगाना है।
हौसले बुलंद हैं फौलाद जैसे, संकट से अब झुकूँगा नहीं,
चाहे मौत सामने खड़ी रहे, मैं लड़ूँगा, पीछे हटूँगा नहीं।
कामयाबी हासिल करनी है, यह ज़िद्द है मेरी, हार नहीं,
मंज़िल को पाकर दम लूँगा, बीच राह में विश्राम नहीं।
कामयाबी तक रुकूँगा नहीं, मैंने खुद से यह वादा किया,
इतिहास रचेगा नाम मेरा, मैंने जंग का शंखनाद किया!
 - भरत भट्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर