वृक्ष से पल्लव झड़ने लगे, नव पल्लव पल्लवित होने लगा
कोयल की कूक सुरीली ध्वनि से बंसत की उदघोष होने लगा
मदनमस्त धरती पर रंग -बिरंगी फूलों छटा छाने लगी
एक अजीब सा तरंग, उमंग, नशा की बयार बहनी लगी
मनुष्य तो क्पा पशु-पक्षियों को उल्लासपूर्ण की नशा छाने लगी
हल्की पवन के झोकों सूचित ने किया कि ऋतुराज बंसत आने लगी
आम के बौर बौरा गये कवि को उन्माद की नशा छाने लगी
उनके लेखनी में एक बासंती रंग स्याही भर ली गई है
बंसत ऋतुराज पर आतुर है कविता लिखने नशा छाने लगी
ॠतुराज बसंत के आगमन के स्वागत करने को तैयार है
बासंती साडी पहनकर धरती खडी है अपने व्दार
ऋतुराज बसंत ने हल्की शीत पवन ने आकर्षित करती भरमार
पहुंच गई ऋतुराज बंसत, पहुँच गई ऋतुराज बंसत
- भागवत प्रसाद नायक
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