आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ऋतुराज बंसत

                
                                                         
                            वृक्ष से पल्लव झड़ने लगे, नव पल्लव पल्लवित होने लगा
                                                                 
                            
कोयल की कूक सुरीली ध्वनि से बंसत की उदघोष होने लगा
मदनमस्त धरती पर रंग -बिरंगी फूलों छटा छाने लगी
एक अजीब सा तरंग, उमंग, नशा की बयार बहनी लगी
मनुष्य तो क्पा पशु-पक्षियों को उल्लासपूर्ण की नशा छाने लगी
हल्की पवन के झोकों सूचित ने किया कि ऋतुराज बंसत आने लगी
आम के बौर बौरा गये कवि को उन्माद की नशा छाने लगी
उनके लेखनी में एक बासंती रंग स्याही भर ली गई है
बंसत ऋतुराज पर आतुर है कविता लिखने नशा छाने लगी
ॠतुराज बसंत के आगमन के स्वागत करने को तैयार है
बासंती साडी पहनकर धरती खडी है अपने व्दार
ऋतुराज बसंत ने हल्की शीत पवन ने आकर्षित करती भरमार
पहुंच गई ऋतुराज बंसत, पहुँच गई ऋतुराज बंसत
- भागवत प्रसाद नायक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर