बाग जब "वो" आई ,बगिया के पुष्पों का आभा घट गई
बगिये के कोने के बेंच बैठ कर फूलों को निहार रहा था
उसके मुखमंडल को देख कर आकर्षित हो रहा था
उसके मुखमंडल की आभा और चलने की अदा
मंद-मंद समीर के बिखेर रही बिखरे जुल्फों को
चहरे में बिखरे केशों को हाथों हटाने की अदा
मुखमंडल का तेज मानो चकाचौंध कर रही थीं
चुपके से चोरी -छुपे निहार आंखें निहार रही थी
मदमस्त चलती "वो"मेरी ओर बढती जा रहीं थी
जैसे ही नजर झपकी वो मेरे करीब आ गई थीं
मैं यंत्रवत उसकी ओर निहारते निहारते रहा
देखकर मुझे लगा झटका कि ये यहाँ आ गई थी
जो मुझे ट्रेन में मिली थी अब यहाॅ आ गई थी
सन्न पड़ गया शरीर और दीमाग सुन्न पड़ गया
जो मेरे समाने खडी थी "वो" परी नहीं चुड़ैल थी
-भागवत प्रसाद नायक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X