आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कबूतर फड़फड़ाते हैं

                
                                                         
                            मेरी आंकाछाएं अधूरी रह गई
                                                                 
                            
जैसे कबूतर उड़ने के लिए फड़फड़ाते हैं
उसी तरह मैं फड़फड़ाता हूं
नई आंकाछा खोज भी अधूरी रह गई
मेरे मस्तिष्क में उथल-पुथल मची है
नये विचार से मैं शांत हो गया
दीमाग की खलबली थम गई
और नये सपनों में खो गया
मैं देखा कि कबूतर शांत हो गया
और दाना चुगने लगने लगा
और फिर फड़फड़ा कर उड़ गया
फिर भी मेरा मन शांत था
विचारों का तूफान भी शांत था
मॅने भी फड़फड़ा कर उड़ने ठान ली
और मैं अपने माता-पिता के पास
वर्षों बाद विमान से उड़ गया
- भागवत प्रसाद नायक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर