इस समय फैंशन की आंधी चली है
हवा नहीं
उघडता बदन दिखाओ तन
अश्लीलता की पराकाष्ठा पर है
अब हम कहां जा रहे हैं
सभ्यता की ओर कि अतीत में
जब कोई बंधन नहीं था
बंधनमुक्त अतीत की ओर
तन में वस्त्र नहीं और यौन मुक्त समाज की ओर
क्या समाज, सरकार कोई तो दखल देगी
न माता-पिता का लिहाज
किसी को लाज
किस मुकाम हम आ गये हैं
कहीं तो विराम लगनी चाहिए
अश्लीलता हवा नहीं
आंधी चली है
- भागवत प्रसाद नायक
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