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खुद की सिसकियां और ख्वाबों के टूटने

                
                                                         
                            असफलता और सफलता के बीज अपने
                                                                 
                            
संग लेकर जा रही हूँ..
राहों में मिले कुछ यादें सपने अपने संग
संजोये जा रही हूँ..
खुद की सिसकियां और ख्वाबों के टूटने
का दर्द दबाये जा रही हूँ..
अपनी साँसों की गहराइयों के बीच
हल्की सी छाप छोड़े जा रही हूँ..
छोड़ रही हूँ मैं उन उम्मीदों को जिसके टूटने
पर होता है बेहद दर्द..उस दर्द को अपने
संग लेकर जा रही हूँ..!!
- ब्यूटी सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
21 घंटे पहले

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