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उसे बचाने उसका घनश्याम आएगा

                
                                                         
                            सफर में इसी उम्मीद से चल रहा हूं ,
                                                                 
                            
कभी तो मेरे हिस्से कोई बड़ा मुकाम आयेगा।

यही सोच कर सबकी मदद करता फिरता हूं
कभी कोई शख़्स भी शायद मेरे काम आएगा।

आंधियों के दर से मैं अपना रास्ता नहीं बदलने वाला,
मेरे कदम पीछे नहीं हटेंगे , चाहे जो भी इसका परिणाम आएगा।

मीरा भी कभी डरी है विष का प्याला पीने से,
कुछ नहीं होगा उसे जानती है वो ,
उसे बचाने उसका घनश्याम आएगा।

-बसंत पंवार प्रजय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 महीने पहले

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