सुनो मुसाफिर! पार उतर कर, तुम तो घर को लौट गए,
पर उस सूखी लकड़ी का क्या, जो लहरों से टकराती है?
सबको पार लगाने वाली नाव नदी में रह जाती है!
दिन भर बोझा ढोती है, और सहती है पानी की मार,
किसने मुड़ कर देखा उसको, जब मिल गया नदिया का पार?
दुनिया ने तो काम निकाला, वो पानी में गल जाती है,
सबको पार लगाने वाली नाव नदी में रह जाती है!
यही रीत है इस दुनिया की, सीढ़ी वहीं खड़ी रहती,
छत पर पहुँचने वाली दुनिया, नीचे देखने से बचती।
जो औरों को राह दिखाए, उसकी उम्र घिस जाती है,
सबको पार लगाने वाली नाव नदी में रह जाती है!
— बजरंग बीकानेरी
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