जब से गई शेरनी जग से दिल्ली दुर्बल लगती थी
जो अपनी दहशत भारत में भरने का बल रखती थी
जिसको कड़े फैसलों से भी कभी नहीं डरते देखा
नसबंदी आपातकाल में खींच जेल भरते देखा।
पाकिस्तान काटकर जिसने बंगला देश बनाया था
कहते हैं कुछ उसे अटल ने दुर्गा कभी बताया था
उसके वर्षों बाद हिंद को जिसने आज संभाला है
उसने अपने रोम रोम पर रंग तिरंगा डाला है।
फैला था आतंक चरम पर दहशत में जन जीते थे
लटकी सर तलवार देखकर घूंट जहर का पीते थे
श्रीनगर के लाल चौक पर हत्यारों का अड्डा था
चारों ओर मौत मंडराती जित देखूँ उत गड्ढा था।
ऐसे हालातों में जिसने उसको भी ललकारा था
जिसने सारी हदें पार कर मानवता को मारा था
जिसने माँ का दूध पिया हो लाल चौक पर आ जाए
फहरा कर मैं रहूँ तिरंगा जो करना हो कर जाए।
जिसके तन में देश प्रेम की ज्वाला खूब धधकती है
दीन दुखी के हालातों पर जिसकी रूह सिसकती है
किसने सोचा था इज़्ज़त घर निर्धन के घर भी होगा
गैस सिलिंडर झुग्गी और झोपड़ी में भी दे देगा।
यू.पी.आई. से भारत में जीवन सुगम बनाया है
विकसित देश कनाडा में भी मैंने देख न पाया है
जिसने भारत उन्नति के रस्ते पर लाकर चला दिया
सारे जग में भारत की ताकत का डंका बजा दिया।
रक्षा के सौदे में हरदम भ्रष्टाचार गूँजता था
सुनकर वीर जवानों की जननी को सांप सूँघता था
रक्षा के साधन भी उत्तम हिन्दुस्तानी बना रहा
बेच बेच कर कुछ देशों से डॉलर भारत कमा रहा।
लगते थे जो काम असम्भव सम्भव करके दिखा दिए
नेक इरादों के संग आगे बढ़ने के गुरु सिखा दिए
हटा तीन सौ सत्तर घाटी भर में झंडा फहराया
संविधान भारत का घाटी में भी लागू करवाया।
तीन तलाक हटाने की कुछ हिम्मत नहीं जुटा पाए
मुश्लिम बहनों के जीवन में खुशियां नहीं लुटा पाए
क्रोध ओढ़कर तन पर जिसने तीन तलाक हटाया है
बहनों के मन से तलाक का जड़ से खौफ मिटाया है।
जिसने सभी सबूत जुटाकर बाधाओं को दूर किया
जन्मभूमि का धुर विरोध तब न्याय भवन ने चूर किया
अब तक अवध न जाने वाले दिल्ली से यदि ना जाते
दशरथ नंदन अपने घर में कभी अवध ना आ पाते।
हर दीवाली साथ मनाकर वीरों का सम्मान किया
नित नवीन तकनीक अस्त्र से सेना को बलवान किया
जिसके एक इशारे पर वीरों ने कर्तव दिखा दिए
मिला दिए मिट्टी में दुश्मन हूरों के ढिंग पठा दिए।
जिसको देश प्रेम के आगे मौत नहीं डरपा पाती
जातिवाद धन दौलत जिस पर कहर नहीं बरपा पाती
ऐसे कर्मवीर से नफरत वही लोग कर पाते हैं
जिनके अंदर जाति, लाभ, शातिर जनाब छा जाते हैं।
जिसने अपनी सूझ बूझ से बल दुनियाँ को दिखा दिया
डींग मारने वालों को भी पानी जी भर पिला दिया
उससे नफरत कर प्रसाद कुछ खुद से छल कर लेते हैं
निजी हितों के लिए विषैला कैसे बल भर लेते हैं।
-भगवती प्रसाद
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