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सिर्फ़ कहने से नहीं बात बनेगी अपनी

                
                                                         
                            ज़िंदगी बोझ सही, फिर भी उठाया जाए।
                                                                 
                            
ज़ख़्म जो दिल में छुपा है वो दिखाया जाए।

सिर्फ़ कहने से नहीं बात बनेगी अपनी,
जो भी रिश्ता है उसे दिल से निभाया जाए।

अपने अपनों से अगर फ़ासले बढ़ते जाएँ,
कोई दीवार तो ऐसी हो गिराया जाए।

बात जब हक़ की हो झुकना नहीं आता हमको,
सर कटे अपना मगर सर न झुकाया जाए।

हर तरफ़ शोर है नफ़रत का सियासत के लिए,
एक आवाज़ मुहब्बत की उठाया जाए।

आईना तोड़ने से चेहरा नहीं बदलेगा,
सामना हो तो हक़ीक़त को बताया जाए।

बे-सबब भीड़ में चलने से भला क्या हासिल,
अपनी मंज़िल का कोई रुख़ तो बनाया जाए।

हर तरफ़ दर्द का तूफ़ान है, 'अज़हर' फिर भी,
दिल के सहरा में कोई दीप जलाया जाए।
- अज़हर साबरी
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48 मिनट पहले

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