सामने तू अगर हो तो मैं क्या करूँ।
दिल अगर बेख़बर हो तो मैं क्या करूँ।
ज़ख़्म सीने में तर हो तो मैं क्या करूँ,
दर्द हद से अगर हो तो मैं क्या करूँ।
आरज़ू दर-ब-दर हो तो मैं क्या करूँ,
फ़ासला मुख़्तसर हो तो मैं क्या करूँ।
मुझको उसको भुलाना भी आसान था,
दिल अगर उसका घर हो तो मैं क्या करूँ।
लोग कहते हैं दिल से निकालूँ तुझे,
तू रगों में बसर हो तो मैं क्या करूँ।
वक़्त कहता है सब कुछ भुला दे मगर,
याद तेरी अमर हो तो मैं क्या करूँ।
जिसको खोने का डर था वही मिल गया,
अब ख़ुशी में भी डर हो तो मैं क्या करूँ।
प्यास बुझती नहीं इक समंदर से भी,
जाम तेरी नज़र हो तो मैं क्या करूँ।
मुस्कुराने की कोशिश तो की थी मगर,
आँख ही नम अगर हो तो मैं क्या करूँ।
ख़ुद को समझाने बैठा था तन्हाई में,
साँस में तू अगर हो तो मैं क्या करूँ।
- अज़हर साबरी
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