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नींद आँखों से जाती रही...

                
                                                         
                            नींद आँखों से जाती रही रात भर।
                                                                 
                            
चाँद बनकर वो आती रही रात भर।

कोई आहट न आई दरीचे तलक,
दिल को दुनिया रुलाती रही रात भर।

सूनी गलियों में फिरता रहा चाँद भी,
चाँदनी दिल जलाती रही रात भर।

बात दिल की ज़ुबाँ तक जो आई नहीं,
बेबसी सर झुकाती रही रात भर।

ख़ामुशी चीखती थी हर एक सम्त से,
बे-रुखी गुनगुनाती रही रात भर।

वक़्त के साथ चलना था लाज़िम मगर,
उम्र पीछे बुलाती रही रात भर।

ज़िंदगी की हक़ीक़त से टकरा के हम,
बे-कसी मुस्कुराती रही रात भर।

इक पुराने फ़साने की खुशबू लिए,
याद दिल को सताती रही रात भर।

सच की दीवार कमज़ोर होती नहीं,
झूठ दुनिया सजाती रही रात भर।

टूट कर भी बिखरने न दी आन को,
शम्अ' ख़ुद को जलाती रही रात भर।

- अज़हर साबरी
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3 घंटे पहले

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