ख़ुदा गरचे रूठे तो सज्दा करूँ,
तुझे भूलने की दुआ क्या करूँ?
मुहब्बत की दुनिया में आकर अगर,
मैं ख़ुद को मुकम्मल तुम्हारा करूँ।
तेरी चाह में ख़ुद को खो दूँ अगर,
तो ख़ुद में ही तुझको तलाशा करूँ।
हवाओं ने बख़्शी है जो तीरगी,
मैं किस मुँह से सूरज का दावा करूँ?
मेरे ज़ख़्म ख़ुद ही गवाही जो दें,
तो फिर दर्द अपना छुपाया करूँ?
जो अपना था, वो अजनबी हो गया,
उसे उम्र भर क्यों पुकारा करूँ?
अगर दिल में बाक़ी मुहब्बत नहीं,
मैं रिश्तों का क्यों फिर दिखावा करूँ?
जो मुक़द्दर में मेरे लिखा ही नहीं,
तो मिलने की फिर मैं दुआ क्या करूँ?
- अज़हर साबरी
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