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तूफ़ानों ने मुझको बहुत आज़माया,

                
                                                         
                            कटा बे-दिली का सफ़र धीरे-धीरे।
                                                                 
                            
उजाला हुआ मेरा घर धीरे-धीरे।

जलाए थे तन्हाइयों में जो दीपक,
उन्हीं से हुई है सहर धीरे-धीरे।

झुकी जब निगाहें इबादत में अपनी,
मिटा दिल का सारा ज़हर धीरे-धीरे।

जिसे सौंप दी थी कभी अपनी दुनिया,
वही कर गया दर-ब-दर धीरे-धीरे।

गिराया था जिसने, उसी की नज़र में,
उठा बनके अपना हुनर धीरे-धीरे।

ज़माने की आँखों में आँखें मिलाकर,
चले हम भी अपनी डगर धीरे-धीरे।

तूफ़ानों ने मुझको बहुत आज़माया,
मगर बन गया मैं शजर धीरे-धीरे।

- अज़हर साबरी
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एक घंटा पहले

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